बहुत दिन बाद कोई हिंदी फिल्म देखने को मिली जिसमें शुरू से आखिर तक एक बार भी न उबासी आई और न ही उसे देखते समय बोरियत महसूस हुई। नहीं तो आजकल लोग सिनेमाघर में फिल्म से जी उचटते ही मोबाइल पर मैसेज चेक करने लगते हैं।
बहुत दिन बाद कोई हिंदी फिल्म देखने को मिली जिसमें शुरू से आखिर तक एक बार भी न उबासी आई और न ही उसे देखते समय बोरियत महसूस हुई। नहीं तो आजकल लोग सिनेमाघर में फिल्म से जी उचटते ही मोबाइल पर मैसेज चेक करने लगते हैं।