कहते हैं, एक सच्चे कलाकार की कला हर धर्म, जाति, पंथ और लिंग की सीमाओं से ऊपर उठकर सिर्फ इंसानियत और भावनाओं की जुबान बोलती है। उसकी कला को समाज की बेड़ियां जकड़ नहीं सकतीं।
कहते हैं, एक सच्चे कलाकार की कला हर धर्म, जाति, पंथ और लिंग की सीमाओं से ऊपर उठकर सिर्फ इंसानियत और भावनाओं की जुबान बोलती है। उसकी कला को समाज की बेड़ियां जकड़ नहीं सकतीं।