ये तीन संवाद इस बात का सबूत हैं कि फिल्म बनाने वालों की दुनिया वालों की नजर में इज्जत क्या रही है, इस देश में। ये उन दिनों की बात है जब ‘मालेगांव का शोले’ बस रिलीज ही हुई थी।
ये तीन संवाद इस बात का सबूत हैं कि फिल्म बनाने वालों की दुनिया वालों की नजर में इज्जत क्या रही है, इस देश में। ये उन दिनों की बात है जब ‘मालेगांव का शोले’ बस रिलीज ही हुई थी।